दोस्त हिन्दी ब्लोग की गरिमा को बनाये रखिए । विवाद मे कुछ नही मिलेगा । किसी के भी पास समय नही है इन बातों कि तह मे जाने का । हो सके तो आप विवाद का अंत करे अपनी तरफ से बढ़ावा ना दे । बिना वजह आपकी सकारात्मक ऊर्जा बर्बाद हो रही है ।

Originally posted as a comment by Naresh Singh Rathore on TECH PREVUE । तकनीक दृष्टा using Disqus.

दोस्त हिन्दी ब्लोग की गरिमा को बनाये रखिए । विवाद मे कुछ नही मिलेगा । किसी के भी पास समय नही है इन बातों कि तह मे जाने का । हो सके तो आप विवाद का अंत करे अपनी तरफ से बढ़ावा ना दे । बिना वजह आपकी सकारात्मक ऊर्जा बर्बाद हो रही है ।

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डा0 अमर कुमार के शब्द हैं: ”यह ठीक है, कि आप बाहर आज़ाद घूम रहे हैं, लेकिन मियाँ जी जूती भी पहना करते हैं । जब तक आप अपने बीमार मन का इलाज़ नहीं करवा लेते, यह जूती यदा कदा प्रयोग कर सकते हैं ! सिर की अदला बदली होती रहेगी, पर उसकी नौबत न ही आयेगी । आपसे ज़्यादा छँटॆ हुये मेरे लौंडे लखनऊ में घूम रहे हैं, जो मेरे दिमाग घूम जाने पर मुझे उपकृत करने को उत्सुक हैं, प्रजापति.. तुम्हारा आई.पी. बैन कर रहा हूँ ! इतने से सँतोष न हो, तो साइट लाक करवा दूँ ? होश में रहो.. तिरँगे को अपमानित करके कालर ऊँची करने जैसे जनखे भ्रम से अब दूर भी हो जाओ । इडियट !!!!!!!”

इतना सब पढ़ने के बाद भी आपको आपत्ति है तो आप ही बतायें यह कहाँ तक सही है?

Originally posted as a comment by Vinay Prajapati on TECH PREVUE । तकनीक दृष्टा using Disqus.

अविस्मरणीय, कम से कम मेरे लिये तो है ही ! दूसरे भभकी देते हों..शेख़ी बघारते हों या कि कुछ और..लेकिन मैं यह नहीं कह सकता कि मैंने दुनिया देखी है, क्यॊकि मेरे लिये अब तक दुनिया के रंग गिन पाना ही कठिन है…सो ?  आज इस दुनिया का एक और रंग देखने को मिला । और यह रंग इस शिद्दत से हावी है, तब से…कि इस समय रात / सुबह के तीन बजे उठ कर यह पोस्ट लिखने बैठा हूँ । पूछिये..आख़िर ऎसा भी क्या हो गया ?

                                                                                             Monkey23

देखा जाये तो..कुछ ख़ास भी नहीं, कि आपको पढ़ने के लिये बाध्य ही किया जाये । ज़रूरी नहीं कि सभी की सभी रचनायें, सभी द्वारा पढ़ी ही जायें । वाक़या – दिन मंगलवार दिनांक 22 जुलाई 2008, समय – दोपहर के लगभग दो बजे का, स्थान – द क्लिनिक बोले तो मेरे दाना पानी का खोखा ! वही रूटीन – मैं, मेरा मरीज़ और मेरे चैम्बर की तन्हाई । अचानक साँस रोके हुये से शांति में एक हलचल , क्या है जी ? मैंने नज़रें उठायी । देखा.. पर्दे की झिरी से चच्चू का आधा चेहरा  अंदर घुसते घुसते जैसे बीच अधर में लटका हुआ थम गया है । चच्चू यानि कि किशोर गुप्ता, उम्र में मुझसे लगभग दस बारह वर्ष छोटे, किंतु उनकी माँ के लंबे इलाज़ के दौरान उपजे रिश्तों से मैं उनको चच्चू कहने लगा । नज़ीतन आज वह जगत-चच्चू हैं । उनकी सज़्ज़नता और सरलता की वज़ह से मैं उनका पूरा आदर करता हूं, सो यह ख़लल बर्दाश्त करके, मैंने पूछा . बोलोगे कि क्या बात है, चच्चू ?

चच्चूजी चुप्प ..उनके चेहरे पर उपस्थित रहने वाली चिर-दीनता जैसे बाढ़ के पानी की तरह, मेरे पूरे चैम्बर में हड़हड़ा कर घुस आयी । उनके ज़बड़े खिंच कर कान के कोरों तक जा  पहुँचे , और अपनी तीन ऊंगलियाँ जोड़ कर इशारा किया..बस एक मिनट ! मैंने बचने का प्रयत्न करते हुये कुछ  आज़िज़ी से फिर दोहराया, ‘ अरे बताओ न, क्या आफ़त टूट पड़ी  ? ‘ फिर वही – जुड़ी हुई व हिलती सी तीन ऊँगलियाँ  …पर इस बार बुक्का फटने जैसा भाव भी चेहरे पर नमूदार हो गया । बगल में बैठे मरीज़ के साथ की जा रही, हिस्ट्री-टेकिंग की साधना तो भंग हो ही चुकी थी, लिहाज़न मैं स्वयं ही उठ कर उनके पास गया । पास पहुंचते ही चच्चू फफक पड़े,..’ वो व्वो वोन्नुपम ने ज़हर खा लिया, क्या होगा अब ? ‘ उनके पीछे नज़र गयी, उनकी पत्नी व दोनों लड़कियाँ हाथ मलती हुई खड़ी ताक रही थीं । मैंने सब-कुछ भाँप कर भी उनको हल्का करना चाहा – ‘ओह्हो, आज सपरिवार ! ‘ अब उनकी पत्नी ने आगे बढ़ कर स्पष्ट किया, “ अनुपम ने ज़हर खा लिया, कोई ज़हरीली दवाई पी ली है । “ अनुपम, उनका इकलौता बेटा,आँख का तारा !

अनुपम..14 वर्ष के दरमियान का ज़हीन लड़का, टी.वी., डी.वी.डी. प्लेयर वगैरह की समझ और मरम्मत में, किसी  ट्रेन्ड इंज़ीनियर को भी पानी पिला देने वाला अनुपम ! इस वयस की उभरती रेखों से ट्रेडमार्कित इलेक्ट्रानिक्स का उभरता सितारा । जो भी हो..यह सब लफ़्फ़ाज़ी बाद के लिये छोड़ देते हैं, अभी तो अनुपम जी को देखें ! मैंने घूम कर स्टूल पर बैठे सज़्ज़न से माफ़ी माँगते हुये, ‘ रुकावट के लिये खेद है..सरीखा ‘ कुछेक   मिनट का अनुपम-ब्रेक लेने की इज़ाज़त चाही, जो सहर्ष मिल गयी । मैं उधर तत्पर होने होने को था, कि वह बोलने को हुये, “ अच्छा ख़ासा  यह भाई-बहन ख़ाना……”, कि मैंने उन्हें बरज दिया । अनुपम का एक सरसरी तौर पर मुआयना किया , दोनों पुतलियाँ बेहद फैली हुई और स्थिर.. रोशनी के प्रति क्षीण प्रतिक्रिया .. एट्रोपीन फ़ेमिली ही है..शायद, बुदबुदाते हुये खुद को आश्वस्त करना चाहा । किंतु प्रत्यक्ष में मुँह से निकला, “कौन सी दवा थी..कुछ अंदाज़ा है ? “ जि..ज्जी, जी हाँ, घर पर शीशी पड़ी है, बल्कि दोनों ही हैं, दिखाऊँ ? और मेरे उत्तर की परवाह किये बिना पलट लिये । तब तक मैं मैन्निटाल वगैरह शुरु कर चुका था । परामर्श व पैथालाज़ी से अधिक और आगे बढ़ने का मैंने  कभी प्रयास ही नहीं किया । बड़ा बवाल है, ( इस पर फिर कभी ) अपनी बेलौस ज़िन्दग़ी, सोच की स्वतंत्रता, पारिवारिक अंतरंगता, मन का चैन.. इत्यादि सबका नाश हो जाता है, और सभी कुछ जोड़ घटा कर बाकी बचता है,..सिफ़र ! कई नर्सिंग होम हैं, यहाँ जिसके डाक्टर..अब छोड़िये भी, चिकित्सक तो कम किंतु मैनेज़र बहुत अच्छे हैं । सो अपरिहार्य परिस्थितियों में उनके प्रबंधन कौशल का लाभ उठाने में कोई बुराई नहीं दिखती और वह अनुगृहीत होते हैं, वो अलग !यहाँ तो दूसरी ही स्थिति थी..

ज़हर-ख़ुरानी बोले तो पाइज़निंग केस कोई भर्ती नहीं करता, कौन लफ़ड़ा पाले ? बेचारा सफ़ेद एप्रन.. x x x कोट से बहुत डरता है, उनकी ज़िरह बस x x x x   x x केन्द्रित हुआ करती है । और अग़र x x x xपढ़े लोग इस x  x x x x    x x x x x  x x x ही समझॊ । सो, यह सारी हिक़मत एक दूसरे एक्ज़ामिनेशन टेबल पर हमारे नियाज़-भाई और सुरेश सोनकर की निगरानी में अंज़ाम दी जा रही थी । कुछ रिश्ते ऎसे बन ही जाते हैं !Surprise

…अल्लाह अल्लाह, खैर सल्लाह ! अनुपम जी कुनमुनाये, चच्चू जी मार्टिन की दो ख़ाली शीशीयों को उद्धिग्नता से लहराते हुये प्रगट हुये, दोनों लड़कियाँ हर्षायीं, श्रीमती चच्चू ने दोनों हाथों से आँचल का कोर पकड़ कर किन्हीं भगवान महोदय को श्रद्धा से नमस्कार किया, फिर मुझे देख कर लज़ा गयीं । नियाज़ भी अपने पैगंबर की प्रसंशा में कुछ बुदबुदा रहे थे । मेरा बेलौस मन बोल पड़ा, ‘अबे तेरा अल्लाह मियाँ, एक क़ाफ़िर की ज़िन्दग़ी क्यों बचाने लगा ? ‘ लोग मेरे इस तरह के खुल्ले मज़ाक का बुरा नहीं मानते । नियाज़ झेंप गये, “ऊऽ ..ऽ सब फाल्तू बात है नु, सऽब तो देखीए तो यक्कही है ।”

कोई चार-पाँच घंटे बाद सबको मैंने असहज मन से राजी-ख़ुशी विदा किया । दि एन्ड..नहीं जी ! मैं तो असहज हूँ, अभी से कहाँ टिपियाने की तैयारी कर रहे हैं आप ? बाद के इन ईज़ी आवर्स में हुये वार्तालाप से यह निचोड़ निकला कि ख़ाना-वाना खा कर सभी भाई बहन एक ख़ुशहाल परिवार के बच्चों की तरह टी.वी. देख रहे थे । संसद में बह्स-वोटिंग वगैरह का प्रहसन चल रहा था…. ..टी.वी. पर लगातार कुछ आ ही रहा होगा, मैंने तो देखा नहीं ! इतने में भाई-बहनों में लड़ाई हो गयी…. दीदी सोनिया की चेली व भईय्या अडवानी का चमचा । संसद की तर्ज़ पर घर में ही हो गया घमासान । दीदी ने पीट दिया, भईय्या ने नोंच लिया । सर्विस शाट इधर से उधर होने लगे । भईय्या अपनी शारीरिक क्षति से कम घायल थे, किंतु अडवानी के अपमान से बिलबिला रहे थे । अंत में इसका बदला लेने का उनको एक ही ज़रिया दिखा, सुसाइड करके दीदियों को मज़ा चखा दो ! बोलो, जय श्रीराम !

मैं ख्वामखाह असहज हो गया, यह तो हमारे राजनीतिक चैतन्यता का ज्वलंत उदाहरण है । मैं तो तय नहीं कर पा रहा, रास्ता कौन दिखाये  question_hanging_man

पुनःश्च ( इसका आजकल प्रचलन है, जी ) कल यह पोस्ट लिख तो लिया, किंतु बिना चच्चू की जानकारी में लाये नेट पर चढ़ाना ठीक न लगा । आज सम्पर्क हुआ, वह ओस्कर के डी.वी.डी. प्लेयर की खूबियाँ किसी ग्राहक को समझाते समझाते लपक कर आये । मेरी बात कुछ समझे ..कुछ शायद नहीं भी समझे । निश्चिंत से सब मुझ पर ही छोड़ दिया,’छाप दीजिये इंटरनेट पर..ये सब तो राजकाज है । कौन देखेगा..कौन पढ़ेगा..पढ़ भी लेगा तो मुझे ही कौन पहचानेगा ?“ अनुपम जी वैसे ही सनाका खाये हुये हैं, आज कमरे से ही नहीं निकले । एक बार उनको दिखला दीजियेगा ।

और कुछ यहाँ भी… उपसंहार तो बाकी ही है

एक अधीर फुसफुसाहट.., “ कौन है, अंदर ? “ फ़ौरन ही जवाब मिलता है, एक खीझभरी जम्हुँआई के साथ.., “ अरे यार कोनो बैग-वाला घुसा बैठा है, तब से ! “ घड़ी पर एक उचटती निग़ाह डालते हुये अपना ग़ुबार निकालता है, “ झोला भर के दवाई ले गवा है..डाक्टरवा के फुसलावत होई, ससुर ..”

यह थी, मेडिकल रिप्रे़ज़ेन्टेटिव को लेकर की गयी किसी प्रतीक्षाकक्ष में बैठे एक सामान्य रोगी की प्रतिक्रिया .. । आम जनमानस में एक रहस्यमय किसिम का प्राणी होता है, यह अनोखा जीव ! मई-जून की दोपहरी में टाई-वाई लगाये पसीने से चुपड़े चेहरे को बार बार पोंछता, अंग्रेज़ी बोलता नौजवान किसी को भी बरबस आकर्षित कर सकता है । कुछ मुरहे-लौंडे फ़ब्ती कसने से बाज भी नहीं आते, ‘ अमें देखो, कवने ग्रह से आवा हवे, ई ज़िनावर ? ‘

डाक्टर व इनके संबन्धों को लेकर बहुतेरी भ्रांतियाँ हैं, आम जनमानस में । यहाँ बतौर डाक्टर, मन से यही निकल रहा कि, ‘ मुफ़्त हुये बदनाम.. ‘

्दवाई-एक टाई वाला ज़िनावर ्दवाई-दो

क्योंकि वस्तुतः ऎसा है नहीं ! न तो ये ज़िनावर हैं, न ही यह झोला भर दवाई लेकर चलते हैं और न ही ये किसी भी संयत डाक्टर को फुसला ही पाते हैं । फिर, एक  फ़ुरसतिया  सवाल..अयं कः ? कः .. तो यह कः भी पेट के खातिर दौड़ते बहुरूपिये हैं । कारपोरेट जगत और कंज़्यूमर के बीच उलझे हुये मकड़जाल में फँसे वेतनभोगी सेल्सकर्मी.. निर्ममता से बोले तो बिचौलिये । इनका डाक्टर से क्या लेना-देना ? तो, यह भी डाकटर को माध्यम बना कर अपनी कंपनी के दवाओं की बिक्री बढ़ाने की ग़ुज़ारिश में  भटकते आम मध्यमवर्गीय आदमी हैं । इनकी इल्तेज़ा में कुछ हनक लाने को यह इनका गलैमरस रूप है । गंदी बनियाइन के ऊपर चमकती कमीज़ और दमघोंटू दुनिया में इनका गला कसता हुआ टाई । लकदक विदेशी परिवेश से देसी मानस को प्रभावित कर सकने की सोच को ढोते बिक्रीदूत । बुरा लग रहा होगा ? सहन करिये, तथ्य तो इससे भी बुरे हैं, बढ़ लीजिये ।

 

                                                                                  haveaniceday

तो यह बिक्रीदूत ( सेल्समैन के लिये, मेरे द्वारा अनायास ही गढ़ लिया गया  शब्द, किंतु कोई दावा या श्रेय मेरा नहीं ) हैव अ नाइस डे, बाँटते हुये नगरी नगरी – द्वारे द्वारे घूमा करते हैं, आख़िर किसके लिये ?  यह कोई समाजसेवा तो नहीं, यहसब केवल अपने और अपनी कम्पनी के हितों के लिये ही तो ! और…कम्पनी तो कम्पनी, वह कारपोरेट मारकेटिंग का ककहरा रटा कर दौड़ा देती है इनको ! जाओ माल बेचो…कम्पनी मुनाफ़ा कमाने के लिये होती है, समाजसेवा में माल लुटाने के लिये नहीं । सो…बंधु, यह ‘ झोला भर के दवाई ले गवा है ‘ की असलियत है, मानें तो ठीक.. न मानें तो भाई,  जयराम जी की…. .., पूड़ी खाइये मिलावटी घी की ! क्योंकि शुद्धता कतिपय व्यक्तियों को माफ़िक नहीं आती, ऎसा ही बताया जाता है,मानने में हर्ज़ भी नहीं है ।

झोली भरी दवाई कीऽ ..ऽ….¶ ¶ ..नाली में फेंक दूँ ऽ¶..¶..ऽ क्योंकि यह कारपोरेट मार्केटिंग के ककहरे का पहला ’क’ है । कन्विंस-कन्फ़्यूज़-करप्ट के वर्णमाला का पहला ‘क‘ ! कन्विंस बोले तो, अगले को कायल करो, विश्वास में लो !क़न्फ़्यूज़ बोले तो, नहीं काबू कर पा रहे हो तो तथ्य घुमाय घुमाय के अगले को बौरिया देयो, भटकने के डर से ऊँगली पकड़े रहेगा !करप्ट बोले तो, अरे..,राम भजो यह भी कोई बताने की बात है, बतायें क्या ?

पंडिताइन सिर पर सवार है, सो आज केवल पहला  ‘क ‘  gobtn से कन्विंस ! ‘झोली भरी दवाई’ यानि कि फ़िज़ीशियन सैम्पल इसी का हिस्सा है ।  तो मेरी असहमति दर्ज़ की जाये कि फ़िज़ीशियन सैम्पल नाम से ही मुझे ऎतराज़ है ! इसकी कई वज़हें हैं, blu_bull_e0 एक – यह एक बहुत बड़ा धोखा है । ब्रांडेड दवाओं के आरंभिक दिनों में ड्यूमेक्स, हेक्ख़्त, ऎबाट इत्यादि कम्पनियों ने भारत सहित कई देशों में अपनी दवाओं के नमूने, डाक्टरों के बीच भारी मात्रा में, व्यक्तिगत मूल्यांकन के नाम पर वितरित किया करते थे । अस्तु, ये तो हुआ ‘ फ़िज़ीशियन सैम्पल ‘ और चूँकि यह मुफ़्त दिये जाने होते थे, सो जुड़ गया ‘ नाट फार सेल ‘ ! क्या यह आज भी उतना ही सच है ? किसी भी दृष्टिकोण से देखें, तो उत्तर मिलेगा..नहीं, क्यों ? blu_bull_e0 दो – क्योंकि, समयांतर में मनुष्यों पर किसी भी प्रकार के दवा के परीक्षण हेतु  हर देश में कड़े वैधानिक एवं आचार-संहिता नियंत्रक नियम जारी कर दिये गये । मानव जीवन अमूल्य है, अतः औषधि-नियंत्रक (Drug-Controller?) द्वारा विशद परीक्षणों के बाद ही उन्हें बाज़ार में लाने की अनुमति मिलती है । Eye-rolling फिर… क्योंकर चल रहा है, आज भी ‘फ़िज़ीशियन सैम्पल-नाट फार सेल ‘? blu_bull_e0 तीन – यदि यह मान लिया जाय कि अपने ब्रांड को अन्य प्रतिस्पर्धी ब्रांड से तुलनात्मक मूल्यांकन के लिये ऎसे ‘ सैम्पल ‘ देना आवश्यक है, तो बेचारे डाक्टर के पास इस तरह के मूल्यांकन के लिये समय, धैर्य और परखने के मापदंड ही कहाँ हैं ? blu_bull_e0 चार – इस तरह के तज़ुर्बे कोई चार-6-आठ अदद टेबलेट्स के बल पर तो नहीं किये जा सकते, सो इनका औचित्य ? न ही कोई गैर-संस्थागत डाक्टर इस तरह की कसरत के लिये अधिकृत ही है, फिर ? blu_bull_e0 पाँच – यदि हमारे नायक का सेल्स टारगेट चौंचक है, तो कोई भी कम्पनी इसकी परवाह नहीं करती कि इन सैम्पल्स का क्या हुआ ? यानि कि दुरुपयोग की खुली ग़ंज़ाइश ! blu_bull_e0 छः – एक भी कम्पनी कभी यह जानकारी नहीं रखती कि यह सैम्पल की दवायें, सरकारी.. गैर-सरकारी.. प्रशिक्षित.. अप्रशिक्षित डाक्टर तक पहुँचे, या बुआ मामी के हितार्थ, या लल्लू-पंज़ू एंड सन्स के काउंटर पर ? blu_bull_e0 सात – यह दो के चार बना कर तो नहीं..अरे रे लम्बा खिंच रहा है..अब बस करें ? ठीक, बस एक और आख़िरी.. blu_bull_e0 आठ – वैसे तो यह मानना निहायत ही बकवास है कि हमलोग न सही तो सरकार ही ब्यौरा ले कि हर सैम्पल के हर खेप में कितना टैक्स व एक्साइज़ ड्यूटी का वारा न्यारा किया जाता है ? चिदंबरम के लगाये फ़्रिंज़ टैक्स से कुछ फ़र्क़ तो पड़ा है, लेकिन ये अपुन का इंडिया है, भिडु.. मुट्ठी गरम.. तो तेवर नरम ! लगे रहो ब्लागर भाई… समझाओ इनको कि इसमें मुफ़्त तो ढूँढ़े मिल गया पर ससुरा बदनाम कहाँ है ? यह तो अब भी नहीं पकड़ पाये कि मलाई चाभैं ललुआ अउर मारे जायें कलुआ । तो इहाँ कलुआ हमरी बिरादरी है, भइय्यू !

क्षमा-याचना – यह  आलेख किसी भी जीवित या मृत मेडिकल रिप्रेज़ेन्टेटिव, वास्तविक या अवास्तविक डाक्टर, ज़ायज़ या नाज़ायज़ कम्पनी को हानि पहुँचाने के उद्देश्य से कदापि नहीं लिखा गया है । यह आलेख केवल सामान्य बुद्धि के बेचारे हिंदी ब्लागरों के लिये, एक हिंदी ब्लागर की ही उपज है । स्पष्टीकरण – रूपांतरण की डिफ़िसियेंसी के चलते यहाँ कुछ तो है यूँ ही निट्ठल्ले का कुप्रभाव परिलक्षित हो रहा होगा । हम नहीं सुधरेंगे, खेद है । धन्यवाद – दैनिक तूफ़ानी दौरे पर निकले ब्लागर बंधुओं का, जिन्होंने कुछेक टाइम यहाँ खोटी किया । टाइम इज प्रीसियस फार एवरी ब्लागर !

हम अपने गिरेबाँ में झाँक चुके, अब आपकी बारी है ! बहुधा एक अल्प पढ़ालिखा आदमी बल्कि कभी कभी अनपढ़ भी, किसी डाक्टर को यह कह कर ख़ारिज़ कर देते हैं कि ‘  डाक्टर समझ में नहीं आये । ‘ मेरे कानों तक भी बात आती है तो मन में यही एक प्रश्न उठता है कि ‘ समझ में आने ‘  का मापदंड क्या रखा होगा इन पारखियों ने ! कोई भी इस कसौटी को आज तक संतोषप्रद ढंग से परिभाषित नहीं सका । फिर यह टिप्पणी क्यों और कैसे ? आप अपनी अपेक्षायें रेखांकित भले न कर पायें हों । मैं चिकित्सक बिरादरी की ओर से कुछ  उनकी अपेक्षायें यहाँ रखना चाहूँगा ..

क्या चाहता है एक डाक्टर अपने मरीज़ से …. acnext_e0 यदि सिलसिलेवार  ढंग से कहें तो, या चलिये प्रश्नवाचक तरीका ज़्यादा सुगम लग रहा है  । वही रहने देते हैं, क्या आप …. 

 कपया स्वयं से पूछें अपनी बारी की प्रतीक्षा एवं धीरज में विश्वास रखते हैं

 कपया स्वयं से पूछें अपने को डाक्टर के यहाँ जाकर अतिविशिष्ट व्यक्ति तो नहीं मानते

 कपया स्वयं से पूछें आप असंगत एवं तर्कहीन प्रश्न करने से परहेज़ रखते हैं

 कपया स्वयं से पूछें अपने साथ भीड़ लेकर डाक्टर के यहाँ मजमा तो नहीं लगाते

 कपया स्वयं से पूछें अपने नियत समय और तिथि पर सलाह हेतु उपस्थित होते हैं

कपया स्वयं से पूछें अपने स्वास्थ्य से ज़्यादा आपका ध्यान तात्कालिक मुद्दों पर तो नहीं रहता

कपया स्वयं से पूछें अपनी यथासंभव मेडिकल जानकारी से अगले को प्रभावित करने का प्रयास तो नहीं करते

कपया स्वयं से पूछें अपने डाक्टर को नियत समय पर फ़ीस देने से तो नहीं कतराते

कपया स्वयं से पूछें अपनी तक़लीफ़ों की डायग्नोसिस स्वयं ही कर डाक्टर से पुष्टि तो नहीं चाहते

कपया स्वयं से पूछें अपना ईलाज़ आप अपनी ही समझ से करके डाक्टर के लिये मुसीबत  तो नहीं खड़ी करते

कपया स्वयं से पूछें अपने डाक्टर के सम्मुख अन्य डाक्टरों, उनके द्वारा दी गयी दवाओं एवं करवाये गये टेस्ट की आलोचना तो नहीं करते

यदि आप इन सभी प्रश्नों पर खरे उतरते हों, तो बेशक आपको किसी भी डाक्टर को समझ न पाने का फ़तवा देने का हक़ है

डाक्टर बनाम मरीज़ - अमर

आपकी बातें ज़ायज़ हो सकती हैं, किंतु आप डाक्टर का कार्य आसान कर सकते हैं यदि आप अपना पूरा हाल किसी काग़ज़ पर लिख कर ले जायें ।  ठीक से न सुने जाने की शिकायत और दोनों के ही समय की बचत होगी । आपकी तक़लीफ़ आपके जीवन की एक घटना है, किंतु यह एक डाक्टर के जीवन की रोज़मर्रा की बात है, अतएव उससे नाटकीय होकर तत्पर होजाने की अपेक्षा करना अनुचित है । यदि आप सोचते हों कि एक बार दी गयी फ़ीस ही आपके आजीवन स्वास्थ्य बीमा की रकम है, तो यह ज़्यादती होगी । तात्कालिक एवं सामयिक मुद्दे, मसलन ‘ आफ़िस से छुट्टी लेकर आयें हैं , बस पकड़नी है, पति लंच पर आते होंगे ‘ इत्यादि का दबाव डाक्टर को विचलित करता है, इनसे बचें । आपके साथ की भीड़ एक संतुलित निर्णय लेने  में बाधक हो सकती है, साथ ही अन्य रोगियों की असुविधा का कारण भी बनती है, आप ऎसा कदापि नहीं चाहेंगे । दूसरे डाक्टरों की आलोचना कर यदि आप अपने चिकित्सक के कृपापात्र बनने की आकांक्षा रखते हों, तो यह हास्यास्पद है । अपनी शंकायें निर्मूल करें ।

डाक्टर आपकी सहायता को तत्पर है, किंतु आपका व्यवहार, विश्वास एवं धैर्य ही उसे बेहतर सेवा की प्रेरणा देता है । इनको अपना कर देखें ..

प्रिय मित्रों

                सर्वप्रथम यह संबोधन अपने व्यवसायिक मित्रों  के लिये ही है । इससे पहले कि, उनमें कहीं से असंतोष या विरोध के स्वर उठें, मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि परस्पर ईर्ष्या, वैमनस्य, चरित्र हनन के चलते, एक सामान्य लिखे पढ़े जागरूक व्यक्ति के लिये चिकित्सकों के बीच चल रहे विचार परिवर्तन एवं क्रिया कलापों को लेकर कुछ भी गोपन नहीं रह गया । इसलिये इनका उल्लेख यहाँ किया जा सकता है, क्योंकि मैं स्वयं तकरीबन तीन दशक से इन बदलावों का साक्षी हूँ । सो मेरा यह कथोपकथन सैद्धान्तिक नहीं बल्कि व्यवहारिक अवधारणाओं पर आधारित है । क्षमा करें, यदि कुछ कटु दिख रहा हो तो,  उसे आप स्वयं ही निष्पक्षता से जाँचें, तत्पश्चात विचार करके बतायें, यदि कुछ असंगत हो ।

डाक्टर और मरीज़ ! दोनों ही परस्पर विलोमार्थी होते हुये भी एक अनोखे रिश्ते से जुड़े हैं, कुछ अज़ीब नहीं लगता कि इतने अलग अलग छोर पर टिके होने पर भी यह दोनों ही कितने विश्वास भरे संबन्ध से बँधे हुये हैं । मरीज़ याने  कि आपके चिकित्सा कौशल से लाभान्वित होने वाला स्वाभाविक हक़दार.. जाति, धर्म, आयु, अगड़े पिछड़े की परिभाषा से परे एक जीवित ईश्वरीय संरचना ! यहाँ वह मात्र एक ट्रीटिंग यूनिट नहीं, बल्कि अपने आप में एक एन्टाइटी है !

हम और तुम

ऎसा लग रहा है कि भाषा कुछ क्लिष्ट होती जा रही है ? अभी ठीक करता हूँ ।

यह बहुत पुरानी बात भी नहीं है,जब परिवारों में उनका एक चिकित्सक हुआ करता था, इन्हें फ़ेमिली डाक्टर भी कहते थे, यानि परिवार का मान  । एक अतिविशिष्ट एवं विश्वसनीय हमदर्द, वह परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य के देखरेख के साथ साथ उनके हर्ष विषाद, शादी ब्याह यहाँ तक  कि उनके आंतरिक विवादों में भी अपना आदेशात्मतक दख़ल रखा करता था । उसके बैग को उठाने को लेकर छीना झपटी मचती थी । और बैग लिये व्यक्ति मुहल्ले में इतरा कर चलता था, भगवान के दूसरे रूप का बोझ ढोने का गर्व ! समाज के किसी भी तबके को यह दर्ज़ा हासिल न था, हाहः ! यह हाय अनायास ही नहीं निकल रही, नई पीढ़ी को अभी यह सब सुनकर सपना लगेगा, एवं आश्चर्य नहीं कि भविष्य में कपोल कल्पना ही लगे ।

यह उपाधि उसे किसी आकाशवाणी के चलते हासिल न हुयी होगी, बल्कि उसकी स्वयं की अर्ज़ित की हुयी थी । कष्ट से कातर मनुष्य को पीड़ामुक्त कराने वाला पैगंबर, उसको सहज़ ही नहीं माना गया होगा । इसी बिन्दु पर  आत्ममंथन करने की आवश्यकता है, और..देखा जाये तो नहीं भी है !

क्योंकि, ऎसी चली है अबकी हवा इस शहर में… भौतिकता की इस हवा में सबके अपने अपने तर्क और कुतर्क हैं, और वह उसी में मगन भी हैं । अस्सी के दशक के उत्तरार्ध से बह रही यह मंद हवा, अब आँधी का रूप लेती जा रही है । अभी से ही इसके धूल गुबार में हमारे वैल्यूज़   धुँधलाते हुये दिख रहे हैं । लगता है कि यह अँधड़ डाक्टर-मरीज़ के पवित्र  रिश्ते का वटवृक्ष उखाड़ फेंकेगा, किंतु मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि ऎसा होगा नहीं । हाँ, तेजी से डोलती शोर मचाती डालियाँ डरा तो रही हैं, किंतु अभी भी भारतीय मान्यताओं की ज़मीन इतनी खोखली नहीं हुयी हैं कि वह इस वृक्ष को ढह जाने दे । यह डाक्टर-मरीज़ के रिश्तों का वटवृक्ष तभी गिरेगा, जब दोनों में से कोई एक पक्ष इसकी जड़ों को अपनी ओर से काट ही न डाले ।

यानि कि दोनों पक्षों के लिये संयम, सुधार एवं संभलने की असीम संभावनायें हैं । आज भगवान का दूसरा रूप कलंकित हो रहा है, नित्य नये लांक्षन सामने आ रहे हैं, गिनाने लगूँ तो शायद शोभनीय न लगे, जैसे किडनी घोटाला, लापरवाही से मौत, बिना आपरेशन चीरा लगा कर गुमराह करना, अपने निहित स्वार्थ के लिये अनाप शनाप जाँचें करवाना, अपने चिकित्सक गँठजोड़ में मरीज़ को घुमाते रहना, दवा कंपनियों के प्रलोभन में आकर उनके हितों की पूर्ति करना.. इत्यादि । ठीक है कि मरीज़ को उपभोक्ता का दर्ज़ा दिये जाने से आप बहुत सारे समझौते करने को बाध्य हैं, किंतु इसके बावज़ूद भी अपना गौरव बचाया जा सकता है । मेरी एक लेडी डाक्टर मित्र की स्वीकारोक्ति है कि अब वह अपने मरीज़ों से कुछ ज़्यादा ही अल्ट्रासाउंड करवाती हैं, क्योंकि जन्मजात विकलांगता निकल आने पर उनके पास कोई साक्ष्य नहीं रहता । भ्रूण के दम घुटने की स्थिति से दो चार होने से पूर्व ही सीज़ेरियन का फ़तवा देना, मरे शिशु के जन्म स्वरूप अपना नर्सिंग होम तुड़वाने से ज़्यादा बुद्धिमतापूर्ण है । बात में दम है !

किंतु यदि उनका आशय यह है कि ये सारी परिस्थितियाँ सरकार, समाज़ और मरीज़ों ने मिल कर उत्पन्न की है, तो बात में कतई दम नहीं है मैं आगे बताऊँगा कि क्यों ? क्योंकि इन आरोपों के मूल में छुपे अधिक से अधिक धन की लालसा का अभी कोई जिक्र ही नहीं आया । सो तो है !

धन की आवश्यकता को कोई नकार नहीं सकता, किंतु कम से कम समय में, न्यूनतम प्रयास से असीमित धन अर्जित करने की लालसा अनिवार्य रूप से अनैतिक हो ही जाती है । यह एक दिग्भ्रमित दौड़ के अलावा कुछ नहीं है । आप जीवन की सीमाओं से परिचित हैं, फिर भी यदि आप यह सिद्ध कर सकें कि अपने सीमित जीवन में आप इस असीमित धन का उपभोग करने में सक्षम हैं, तो मैं तत्काल यह पोस्ट हटा लूँगा ।पक्की बात!

इस अंतहीन लालसा से बचें, अपने दायित्व की गरिमा का निर्वाह करें एवं समाज आपको जो सम्मान दे रहा है, उसका आदर करें ।  यह कठिन नहीं है । यह मैं अपने निजी अनुभवों के आधार पर कह रहा हूँ । यह ठीक है, कि मरीज़ एवं मरीज़ का संबन्धी बहुत ही स्वार्थी होता है । इसको आप सामान्य मनोविज्ञान की दृष्टि से ही देखें, यह मानव में अंतर्निहित गुण है । वह तो भगवान को भी ज़रूरत के समय सैकड़ों प्रलोभन परोस देता है, फिर आप तो दूसरे नम्बर पर हैं ! क्या आपको इस पायदान से नीचे गिर जाना चाहिये ? कोई ऎसा अवसर आने ही न दें ।

पर उपदेश कुशल बहुतेरे, शायद कोई ऎसी टिप्पणी भी आ सकती है । किंतु मैं इसकी परवाह किये बिना अपनी बात जारी रखूँगा । यह उदाहरण है कि आप भी अपने व्यक्तिगत जीवन में, बल्कि व्यवसाय में इन टिप्पणियों की चिन्ता न किया करें । क्योंकि ये टिप्पणियाँ ही आपको अतिमानव होने का भ्रम देती हैं, और इन्हीं टिप्पणियों के ज़रिये आप दानव भी कहे जाते हैं । समाज ही  आपका दंभ बनाता भी है और तोड़ता  भी है । फिर ?

फिर.., किसी प्रकार के प्रतिकार की आवश्यकता ही नहीं है, पड़ेगी भी नहीं । क्योंकि एक बेहतर संवाद आपको इस स्थिति से उबार सकता है । मेरे ख़्याल और अनुभव से, संवादहीनता संबन्धों को जड़ बना देती है, और यही डाक्टर मरीज़ के रिश्तों के साथ भी हो रहा है । मेरा विश्वास करें !

और विश्वास का आधार है, मेरे पास ! यदि किसी भी आगंतुक मरीज़ एवं उसके संम्बन्धी को यह जता दिया जाये कि आप भी उसी की तरह हाड़ माँस कि संरचना हैं, कोई अतिमानव नहीं, उसकी अपेक्षाओं पर पहले ही अंकुश लगा दें ( किंतु अपने कार्य में निष्ठावान रहें ) वह आपके मानवीय  आवश्यकताओं से, आपके दैनिक दिनचर्या से रूबरू हो ले, तो निश्चित मानें कि वह किसी भी प्रकार के हानि हो जाने की दशा में आप पर पत्थर तो कदापि नहीं फेंकेगा । फिर भी आपका ‘ दूसरा भगवान ‘ आपके साथ ही रहेगा । उसके कंज़्यूमर होने के मिथ को मैं पहले ही तोड़ देता हूँ, यदि एक अल्ट्रासाउंड करवाने को लिखा, तो यह भी जता देता हूँ कि इसकी उतनी आवश्यकता नहीं है, फिर भी कोई विवाद होने पर यह सबूत के तौर पर मौज़ूद होना चाहिये, और यहीं पर उसकी टेढ़ी सोच पर लगाम लग जाता है । किंन्ही अपरिहार्य स्थितियों में मँहगी दवा लिखे जाने पर अपनी विवशता को जाहिर कर सरकार को कोसते हुये माफ़ी माँग लेता हूँ । वह सब कुछ भूल पैर छूने को उद्धत हो जाता है । यकीन मानिये यह कोई दिखावा या नाटक नहीं होता, वस्तुस्थिति से उसे दो चार कराना आप दोनों के हित में सहायक है । उसको गुमराह होने से बचाइये, भले ही वह आपसे उपचार न करा रहा हो, घूम फिर कर आपके पास ही आयेगा । उसे लगने तो दीजिये कि आप जैसा सहज विकल्प उसके पास नहीं है । किंतु क्षणिक लाभ हेतु अन्य डाक्टरों की आलोचना न करें । अपने को भरसक पारदर्शी बनायें, इसके लिये  ज़रूरत है, संवादहीनता से उबरने की ।

आप उनकी निगाह से शक का पर्दा हटाइये, तभी आपको ‘ दूसरे भगवान ‘ का उद्बोधन वापस मिलेगा । अच्छा तो अब चलता हूँ, इति शुभम !

आभार; श्री शिवकुमार मिश्र एवं अन्य मित्रों का, जिनके हालिया पोस्ट एवं अनुभवों ने महीनों से  लंबित इस परिकल्पित पोस्ट को लिखने की प्रेरणा दी, बल्कि ईमानदारी से स्वीकार करूँ, तो खड़बड़ा दिया । जो भी हो, यह पोस्ट पूरा करना संभव किया । साथ ही, यहाँ पर वर्णित तथ्यों से असहमत होने की स्वतंत्रता आपके आधीन है । आप सबका धन्यवाद एवं आभार !

सुख की परिभाषा व सीमा मैं निर्धारित नहीं कर पाता । फिर भी कुछ ऎसे क्षण अनायास टकराते हैं कि मन एक अनाम आह्लाद से भर जाता है । हमारे हृदय को क्या पुलक से भर देता है, क्या नहीं ? इसको आप क्या शब्दों की सीमा में बाँध सकते हैं ?  जैसे कि पोपले मुँह यह हँसी क्या कह रही है ?

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इन छवियों की निष्कलुषता स्वयं ही प्रमाण है ! यह जीवन के दो अलग अलग छोर पर हैं, पर ऎसे हास्य की कोई आयुसीमा तो होती नहीं, क्यों ? कभी उदर क्षुधा शांत होने के बाद के चेहरे की आश्वस्ति को आप पढ़ पाये हैं ? नहीं ना ? तो फिर उनमें निहित भाव आप तक कैसे प्रेषित हुआ ? आश्चर्य है !

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इनको ही देखें ! अलग अलग देश, इनका अपना अलग ही परिवेश, अलग अलग भाषा फिर भी इनको आप भली भाँति पढ़ व समझ पा रहे हैं । कैसे ? निश्चित ही यह आपको किसीने सिखाया न होगा । ऎसे संप्रेषण की क्षमता यह सहज ही अपने में समेटे हैं और हम  आप भी एक दूसरे को पढ़ लेते हैं ! यह सुख दुःख की भाषा आख़िरकार देश, काल, धर्म, जाति इत्यादि के बहुत ऊपर स्वतः अपने को प्रेषित कैसे कर लेती है ? आश्चर्य है, हाँ वह तो है ही !

आपमें से लगभग हर कोई कम्प्यूटर का इतना जानकार है कि मायने आईने की तरह साफ़ है, कंट्रोल अल्टर डिलीट यानि सिस्टम रिस्टार्ट ! फिर यह संबोधन शीर्षक चिकित्सीय संदर्भ में कहाँ घुसपैठ लगा रहा है ? मैंने ही अपनी अवधारणाओं के चलते इस पन्ने का यह नामकरण किया है । कैसा लग रहा है, यह सब ? मैं बताता हूँ कि क्यों ?

आप सब एक डाक्टर को ख़ुदा समझें, दूसरा भगवान याकि कुछ और.. आपकी सोच पर मेरा दखल नहीं रहेगा । और यदि कोई डाक्टर इसी ग़ुमान में जीने लग पड़ा हो, तो इसको निश्चित ही  उसकी ईमानदारी नहीं कही जायेगी। क्यों ?

क्योंकि वह भलीभाँति जानता है कि उसका वृहद चिकित्सीय ज्ञान केवल इतना ही है, जितना कि एक बालक समुद्र के किनारे खड़े हो, समुद्र के विस्तार को आँकने की कोशिश में सफल हो पाता है । विज्ञान का शिखर आखिरकार दर्शन पर जा कर टिक जाता है , जहाँ से विज्ञान के लगभग हर शाख की उत्पत्ति हुयी थी । फिर, कंट्रोल अल्टर डिलीट क्या है

                                            डा० अमर का स्टेथोस्कोप

व्याधिविज्ञान एवं मानव शरीर व मस्तिष्क की संचरचना में निहित बारीकियाँ निःसंदेह अभिभूत कर देने वाली हैं । यह नैनो टेक्नोलोज़ी, इलेक्ट्रानिक्स, मैकेनिकल एवं केमिकल यांत्रिकी इत्यादि का अद्भुत संमिश्रण है । एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक डाटा ट्रांस्फ़र का होना एक अबूझ पहेली है । इसी सबको वस्तुपरक तरीके से समझने एवं समझाने की नित नई तकनीकों के विकास में ही हमारा विज्ञान आज भी उलझा हुआ है । अंततः इसके निर्माता एवं संचालक के समक्ष पूरी मानव जाति नतमस्तक है । अब इसको आप ईश्वर, प्रकृति या कुछ और नाम दे दीजिये, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?

चुँकि मेरे सामने रखे कंप्यूटर से यह सब आपके कंप्यूटर तक पहुँचाया जा रहा है, इसलिये इस पन्ने को कंप्यूटरीय भाषा का यह नाम सोहता है । कंट्रोल अल्टर डिलीट तो कंप्यूटर के एक निर्देश या प्रक्रिया का नाम है, तो फिर यहाँ ?

यह तो निर्विवादित है कि मानव संरचना के फ़ार्मेटिंग से लेकर अंतिम शट-डाउन तक, सभीकुछ स्वतः ( automatic) है, इसपर किसी का अधिकार नहीं है, और यह शायद भविष्य में भी न होगा । ऎसा कोई प्रयास भी आत्मघाती होगा ।

जीवन के फ़ार्मेटिंग से लेकर इहलीला के शट-डाउन के बीच जब कभी इसके हैंग होने की, पूर्व प्रोग्रामित सिस्टम में अवांछनीय रज़िस्ट्री एरर आने की , वाइरस स्पाईवेयर एडवेयर ट्रोज़न इत्यादि के संक्रमण की या हार्डवेयर के मरम्मत की स्थिति आती है, तो यह डाक्टर नामधारी मैकेनिक इसको भरसक सुधार कर रिस्टार्ट करने का प्रयास करता है, यानि कंट्रोल अल्टर डिलीट !  यह सब सुनने में स्वाभाविक लगता है, पर है न अद्भुत ? पर यह सब ऎसा ही है ।

मेरी अवधारणा से असहमत होने का आपको पूरा अधिकार है । पर इन असहमतियों का भी स्वागत है, क्योंकि ऎसे असहमत होते रहने से ही नित नये अर्थ एवं तथ्य उभर कर सामने आते हैं । हमारी बौद्धिक प्रगति की परिचायक !

मनुष्य स्वयं अपनी प्रोग्रामिंग को मोडिफ़ाई करने के प्रयोग करता रहे, ज़ेनेटिक स्तर की रज़िस्ट्री को ट्वीक करने में जुटा रहे, किंतु उसका जीवन चिकित्सक द्वारा बारंबार रिस्टार्ट किये जाते रहने से ही सुगम एवं सह्य बना रह पाता है । तो, यह है मेरा कंट्रोल अल्टर डिलीट !

वर्ड्प्रेस पर मेरे ब्लाग चल नहीं पाते, पता नहीं क्यों ? शायद मेरा अनाड़ीपन ही हो । मनुष्य की नाड़ी पर पकड़ बना लेने से ही कोई सर्वज्ञ तो नहीं हो जाता । चलो एक शुरुआत फ़िर सही, प्रतिष्ठित भले हो किंतु वर्डप्रेस सुगम्य नहीं लगता, जाने क्यों ? आज बच्चों का वालपेपर संग्रह देख रहा कि ….

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सहसा इन दोनों छवियों पर निगाह टिक गयी । देखा, कई कई बार देखा, देखता ही रहा । लग रहा था कि ये चित्र कोई संदेश दे रहे हैं, किंतु जैसे किसी अबूझ भाषा में ! यह ममता, वात्सल्य की श्रेणी से परे की कोई अभिव्यक्ति है । दोनों शिशुओं के चेहरे से झलकता अपार संतोष, जैसे पूरी दुनिया जकड़ रखी हो । याकि उनके सुरक्षित होने के भाव को मैं पढ़ नहीं पा रहा हूँ, दोनों ही माँ के गले को जैसे अपने अस्तित्व का संबल पाकर झूम रहे हों । मैं तो इस रिश्ते को कोई शब्द ही नहीं दे पा रहा हूँ । भला, आप क्या कहते हैं ? बताइयेगा अवश्य ! इस नैसर्गिक भाव को एक शब्द की आवश्यकता है ।