प्रिय मित्रों

                सर्वप्रथम यह संबोधन अपने व्यवसायिक मित्रों  के लिये ही है । इससे पहले कि, उनमें कहीं से असंतोष या विरोध के स्वर उठें, मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि परस्पर ईर्ष्या, वैमनस्य, चरित्र हनन के चलते, एक सामान्य लिखे पढ़े जागरूक व्यक्ति के लिये चिकित्सकों के बीच चल रहे विचार परिवर्तन एवं क्रिया कलापों को लेकर कुछ भी गोपन नहीं रह गया । इसलिये इनका उल्लेख यहाँ किया जा सकता है, क्योंकि मैं स्वयं तकरीबन तीन दशक से इन बदलावों का साक्षी हूँ । सो मेरा यह कथोपकथन सैद्धान्तिक नहीं बल्कि व्यवहारिक अवधारणाओं पर आधारित है । क्षमा करें, यदि कुछ कटु दिख रहा हो तो,  उसे आप स्वयं ही निष्पक्षता से जाँचें, तत्पश्चात विचार करके बतायें, यदि कुछ असंगत हो ।

डाक्टर और मरीज़ ! दोनों ही परस्पर विलोमार्थी होते हुये भी एक अनोखे रिश्ते से जुड़े हैं, कुछ अज़ीब नहीं लगता कि इतने अलग अलग छोर पर टिके होने पर भी यह दोनों ही कितने विश्वास भरे संबन्ध से बँधे हुये हैं । मरीज़ याने  कि आपके चिकित्सा कौशल से लाभान्वित होने वाला स्वाभाविक हक़दार.. जाति, धर्म, आयु, अगड़े पिछड़े की परिभाषा से परे एक जीवित ईश्वरीय संरचना ! यहाँ वह मात्र एक ट्रीटिंग यूनिट नहीं, बल्कि अपने आप में एक एन्टाइटी है !

हम और तुम

ऎसा लग रहा है कि भाषा कुछ क्लिष्ट होती जा रही है ? अभी ठीक करता हूँ ।

यह बहुत पुरानी बात भी नहीं है,जब परिवारों में उनका एक चिकित्सक हुआ करता था, इन्हें फ़ेमिली डाक्टर भी कहते थे, यानि परिवार का मान  । एक अतिविशिष्ट एवं विश्वसनीय हमदर्द, वह परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य के देखरेख के साथ साथ उनके हर्ष विषाद, शादी ब्याह यहाँ तक  कि उनके आंतरिक विवादों में भी अपना आदेशात्मतक दख़ल रखा करता था । उसके बैग को उठाने को लेकर छीना झपटी मचती थी । और बैग लिये व्यक्ति मुहल्ले में इतरा कर चलता था, भगवान के दूसरे रूप का बोझ ढोने का गर्व ! समाज के किसी भी तबके को यह दर्ज़ा हासिल न था, हाहः ! यह हाय अनायास ही नहीं निकल रही, नई पीढ़ी को अभी यह सब सुनकर सपना लगेगा, एवं आश्चर्य नहीं कि भविष्य में कपोल कल्पना ही लगे ।

यह उपाधि उसे किसी आकाशवाणी के चलते हासिल न हुयी होगी, बल्कि उसकी स्वयं की अर्ज़ित की हुयी थी । कष्ट से कातर मनुष्य को पीड़ामुक्त कराने वाला पैगंबर, उसको सहज़ ही नहीं माना गया होगा । इसी बिन्दु पर  आत्ममंथन करने की आवश्यकता है, और..देखा जाये तो नहीं भी है !

क्योंकि, ऎसी चली है अबकी हवा इस शहर में… भौतिकता की इस हवा में सबके अपने अपने तर्क और कुतर्क हैं, और वह उसी में मगन भी हैं । अस्सी के दशक के उत्तरार्ध से बह रही यह मंद हवा, अब आँधी का रूप लेती जा रही है । अभी से ही इसके धूल गुबार में हमारे वैल्यूज़   धुँधलाते हुये दिख रहे हैं । लगता है कि यह अँधड़ डाक्टर-मरीज़ के पवित्र  रिश्ते का वटवृक्ष उखाड़ फेंकेगा, किंतु मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि ऎसा होगा नहीं । हाँ, तेजी से डोलती शोर मचाती डालियाँ डरा तो रही हैं, किंतु अभी भी भारतीय मान्यताओं की ज़मीन इतनी खोखली नहीं हुयी हैं कि वह इस वृक्ष को ढह जाने दे । यह डाक्टर-मरीज़ के रिश्तों का वटवृक्ष तभी गिरेगा, जब दोनों में से कोई एक पक्ष इसकी जड़ों को अपनी ओर से काट ही न डाले ।

यानि कि दोनों पक्षों के लिये संयम, सुधार एवं संभलने की असीम संभावनायें हैं । आज भगवान का दूसरा रूप कलंकित हो रहा है, नित्य नये लांक्षन सामने आ रहे हैं, गिनाने लगूँ तो शायद शोभनीय न लगे, जैसे किडनी घोटाला, लापरवाही से मौत, बिना आपरेशन चीरा लगा कर गुमराह करना, अपने निहित स्वार्थ के लिये अनाप शनाप जाँचें करवाना, अपने चिकित्सक गँठजोड़ में मरीज़ को घुमाते रहना, दवा कंपनियों के प्रलोभन में आकर उनके हितों की पूर्ति करना.. इत्यादि । ठीक है कि मरीज़ को उपभोक्ता का दर्ज़ा दिये जाने से आप बहुत सारे समझौते करने को बाध्य हैं, किंतु इसके बावज़ूद भी अपना गौरव बचाया जा सकता है । मेरी एक लेडी डाक्टर मित्र की स्वीकारोक्ति है कि अब वह अपने मरीज़ों से कुछ ज़्यादा ही अल्ट्रासाउंड करवाती हैं, क्योंकि जन्मजात विकलांगता निकल आने पर उनके पास कोई साक्ष्य नहीं रहता । भ्रूण के दम घुटने की स्थिति से दो चार होने से पूर्व ही सीज़ेरियन का फ़तवा देना, मरे शिशु के जन्म स्वरूप अपना नर्सिंग होम तुड़वाने से ज़्यादा बुद्धिमतापूर्ण है । बात में दम है !

किंतु यदि उनका आशय यह है कि ये सारी परिस्थितियाँ सरकार, समाज़ और मरीज़ों ने मिल कर उत्पन्न की है, तो बात में कतई दम नहीं है मैं आगे बताऊँगा कि क्यों ? क्योंकि इन आरोपों के मूल में छुपे अधिक से अधिक धन की लालसा का अभी कोई जिक्र ही नहीं आया । सो तो है !

धन की आवश्यकता को कोई नकार नहीं सकता, किंतु कम से कम समय में, न्यूनतम प्रयास से असीमित धन अर्जित करने की लालसा अनिवार्य रूप से अनैतिक हो ही जाती है । यह एक दिग्भ्रमित दौड़ के अलावा कुछ नहीं है । आप जीवन की सीमाओं से परिचित हैं, फिर भी यदि आप यह सिद्ध कर सकें कि अपने सीमित जीवन में आप इस असीमित धन का उपभोग करने में सक्षम हैं, तो मैं तत्काल यह पोस्ट हटा लूँगा ।पक्की बात!

इस अंतहीन लालसा से बचें, अपने दायित्व की गरिमा का निर्वाह करें एवं समाज आपको जो सम्मान दे रहा है, उसका आदर करें ।  यह कठिन नहीं है । यह मैं अपने निजी अनुभवों के आधार पर कह रहा हूँ । यह ठीक है, कि मरीज़ एवं मरीज़ का संबन्धी बहुत ही स्वार्थी होता है । इसको आप सामान्य मनोविज्ञान की दृष्टि से ही देखें, यह मानव में अंतर्निहित गुण है । वह तो भगवान को भी ज़रूरत के समय सैकड़ों प्रलोभन परोस देता है, फिर आप तो दूसरे नम्बर पर हैं ! क्या आपको इस पायदान से नीचे गिर जाना चाहिये ? कोई ऎसा अवसर आने ही न दें ।

पर उपदेश कुशल बहुतेरे, शायद कोई ऎसी टिप्पणी भी आ सकती है । किंतु मैं इसकी परवाह किये बिना अपनी बात जारी रखूँगा । यह उदाहरण है कि आप भी अपने व्यक्तिगत जीवन में, बल्कि व्यवसाय में इन टिप्पणियों की चिन्ता न किया करें । क्योंकि ये टिप्पणियाँ ही आपको अतिमानव होने का भ्रम देती हैं, और इन्हीं टिप्पणियों के ज़रिये आप दानव भी कहे जाते हैं । समाज ही  आपका दंभ बनाता भी है और तोड़ता  भी है । फिर ?

फिर.., किसी प्रकार के प्रतिकार की आवश्यकता ही नहीं है, पड़ेगी भी नहीं । क्योंकि एक बेहतर संवाद आपको इस स्थिति से उबार सकता है । मेरे ख़्याल और अनुभव से, संवादहीनता संबन्धों को जड़ बना देती है, और यही डाक्टर मरीज़ के रिश्तों के साथ भी हो रहा है । मेरा विश्वास करें !

और विश्वास का आधार है, मेरे पास ! यदि किसी भी आगंतुक मरीज़ एवं उसके संम्बन्धी को यह जता दिया जाये कि आप भी उसी की तरह हाड़ माँस कि संरचना हैं, कोई अतिमानव नहीं, उसकी अपेक्षाओं पर पहले ही अंकुश लगा दें ( किंतु अपने कार्य में निष्ठावान रहें ) वह आपके मानवीय  आवश्यकताओं से, आपके दैनिक दिनचर्या से रूबरू हो ले, तो निश्चित मानें कि वह किसी भी प्रकार के हानि हो जाने की दशा में आप पर पत्थर तो कदापि नहीं फेंकेगा । फिर भी आपका ‘ दूसरा भगवान ‘ आपके साथ ही रहेगा । उसके कंज़्यूमर होने के मिथ को मैं पहले ही तोड़ देता हूँ, यदि एक अल्ट्रासाउंड करवाने को लिखा, तो यह भी जता देता हूँ कि इसकी उतनी आवश्यकता नहीं है, फिर भी कोई विवाद होने पर यह सबूत के तौर पर मौज़ूद होना चाहिये, और यहीं पर उसकी टेढ़ी सोच पर लगाम लग जाता है । किंन्ही अपरिहार्य स्थितियों में मँहगी दवा लिखे जाने पर अपनी विवशता को जाहिर कर सरकार को कोसते हुये माफ़ी माँग लेता हूँ । वह सब कुछ भूल पैर छूने को उद्धत हो जाता है । यकीन मानिये यह कोई दिखावा या नाटक नहीं होता, वस्तुस्थिति से उसे दो चार कराना आप दोनों के हित में सहायक है । उसको गुमराह होने से बचाइये, भले ही वह आपसे उपचार न करा रहा हो, घूम फिर कर आपके पास ही आयेगा । उसे लगने तो दीजिये कि आप जैसा सहज विकल्प उसके पास नहीं है । किंतु क्षणिक लाभ हेतु अन्य डाक्टरों की आलोचना न करें । अपने को भरसक पारदर्शी बनायें, इसके लिये  ज़रूरत है, संवादहीनता से उबरने की ।

आप उनकी निगाह से शक का पर्दा हटाइये, तभी आपको ‘ दूसरे भगवान ‘ का उद्बोधन वापस मिलेगा । अच्छा तो अब चलता हूँ, इति शुभम !

आभार; श्री शिवकुमार मिश्र एवं अन्य मित्रों का, जिनके हालिया पोस्ट एवं अनुभवों ने महीनों से  लंबित इस परिकल्पित पोस्ट को लिखने की प्रेरणा दी, बल्कि ईमानदारी से स्वीकार करूँ, तो खड़बड़ा दिया । जो भी हो, यह पोस्ट पूरा करना संभव किया । साथ ही, यहाँ पर वर्णित तथ्यों से असहमत होने की स्वतंत्रता आपके आधीन है । आप सबका धन्यवाद एवं आभार !