एक अधीर फुसफुसाहट.., “ कौन है, अंदर ? “ फ़ौरन ही जवाब मिलता है, एक खीझभरी जम्हुँआई के साथ.., “ अरे यार कोनो बैग-वाला घुसा बैठा है, तब से ! “ घड़ी पर एक उचटती निग़ाह डालते हुये अपना ग़ुबार निकालता है, “ झोला भर के दवाई ले गवा है..डाक्टरवा के फुसलावत होई, ससुर ..”

यह थी, मेडिकल रिप्रे़ज़ेन्टेटिव को लेकर की गयी किसी प्रतीक्षाकक्ष में बैठे एक सामान्य रोगी की प्रतिक्रिया .. । आम जनमानस में एक रहस्यमय किसिम का प्राणी होता है, यह अनोखा जीव ! मई-जून की दोपहरी में टाई-वाई लगाये पसीने से चुपड़े चेहरे को बार बार पोंछता, अंग्रेज़ी बोलता नौजवान किसी को भी बरबस आकर्षित कर सकता है । कुछ मुरहे-लौंडे फ़ब्ती कसने से बाज भी नहीं आते, ‘ अमें देखो, कवने ग्रह से आवा हवे, ई ज़िनावर ? ‘

डाक्टर व इनके संबन्धों को लेकर बहुतेरी भ्रांतियाँ हैं, आम जनमानस में । यहाँ बतौर डाक्टर, मन से यही निकल रहा कि, ‘ मुफ़्त हुये बदनाम.. ‘

्दवाई-एक टाई वाला ज़िनावर ्दवाई-दो

क्योंकि वस्तुतः ऎसा है नहीं ! न तो ये ज़िनावर हैं, न ही यह झोला भर दवाई लेकर चलते हैं और न ही ये किसी भी संयत डाक्टर को फुसला ही पाते हैं । फिर, एक  फ़ुरसतिया  सवाल..अयं कः ? कः .. तो यह कः भी पेट के खातिर दौड़ते बहुरूपिये हैं । कारपोरेट जगत और कंज़्यूमर के बीच उलझे हुये मकड़जाल में फँसे वेतनभोगी सेल्सकर्मी.. निर्ममता से बोले तो बिचौलिये । इनका डाक्टर से क्या लेना-देना ? तो, यह भी डाकटर को माध्यम बना कर अपनी कंपनी के दवाओं की बिक्री बढ़ाने की ग़ुज़ारिश में  भटकते आम मध्यमवर्गीय आदमी हैं । इनकी इल्तेज़ा में कुछ हनक लाने को यह इनका गलैमरस रूप है । गंदी बनियाइन के ऊपर चमकती कमीज़ और दमघोंटू दुनिया में इनका गला कसता हुआ टाई । लकदक विदेशी परिवेश से देसी मानस को प्रभावित कर सकने की सोच को ढोते बिक्रीदूत । बुरा लग रहा होगा ? सहन करिये, तथ्य तो इससे भी बुरे हैं, बढ़ लीजिये ।

 

                                                                                  haveaniceday

तो यह बिक्रीदूत ( सेल्समैन के लिये, मेरे द्वारा अनायास ही गढ़ लिया गया  शब्द, किंतु कोई दावा या श्रेय मेरा नहीं ) हैव अ नाइस डे, बाँटते हुये नगरी नगरी – द्वारे द्वारे घूमा करते हैं, आख़िर किसके लिये ?  यह कोई समाजसेवा तो नहीं, यहसब केवल अपने और अपनी कम्पनी के हितों के लिये ही तो ! और…कम्पनी तो कम्पनी, वह कारपोरेट मारकेटिंग का ककहरा रटा कर दौड़ा देती है इनको ! जाओ माल बेचो…कम्पनी मुनाफ़ा कमाने के लिये होती है, समाजसेवा में माल लुटाने के लिये नहीं । सो…बंधु, यह ‘ झोला भर के दवाई ले गवा है ‘ की असलियत है, मानें तो ठीक.. न मानें तो भाई,  जयराम जी की…. .., पूड़ी खाइये मिलावटी घी की ! क्योंकि शुद्धता कतिपय व्यक्तियों को माफ़िक नहीं आती, ऎसा ही बताया जाता है,मानने में हर्ज़ भी नहीं है ।

झोली भरी दवाई कीऽ ..ऽ….¶ ¶ ..नाली में फेंक दूँ ऽ¶..¶..ऽ क्योंकि यह कारपोरेट मार्केटिंग के ककहरे का पहला ’क’ है । कन्विंस-कन्फ़्यूज़-करप्ट के वर्णमाला का पहला ‘क‘ ! कन्विंस बोले तो, अगले को कायल करो, विश्वास में लो !क़न्फ़्यूज़ बोले तो, नहीं काबू कर पा रहे हो तो तथ्य घुमाय घुमाय के अगले को बौरिया देयो, भटकने के डर से ऊँगली पकड़े रहेगा !करप्ट बोले तो, अरे..,राम भजो यह भी कोई बताने की बात है, बतायें क्या ?

पंडिताइन सिर पर सवार है, सो आज केवल पहला  ‘क ‘  gobtn से कन्विंस ! ‘झोली भरी दवाई’ यानि कि फ़िज़ीशियन सैम्पल इसी का हिस्सा है ।  तो मेरी असहमति दर्ज़ की जाये कि फ़िज़ीशियन सैम्पल नाम से ही मुझे ऎतराज़ है ! इसकी कई वज़हें हैं, blu_bull_e0 एक – यह एक बहुत बड़ा धोखा है । ब्रांडेड दवाओं के आरंभिक दिनों में ड्यूमेक्स, हेक्ख़्त, ऎबाट इत्यादि कम्पनियों ने भारत सहित कई देशों में अपनी दवाओं के नमूने, डाक्टरों के बीच भारी मात्रा में, व्यक्तिगत मूल्यांकन के नाम पर वितरित किया करते थे । अस्तु, ये तो हुआ ‘ फ़िज़ीशियन सैम्पल ‘ और चूँकि यह मुफ़्त दिये जाने होते थे, सो जुड़ गया ‘ नाट फार सेल ‘ ! क्या यह आज भी उतना ही सच है ? किसी भी दृष्टिकोण से देखें, तो उत्तर मिलेगा..नहीं, क्यों ? blu_bull_e0 दो – क्योंकि, समयांतर में मनुष्यों पर किसी भी प्रकार के दवा के परीक्षण हेतु  हर देश में कड़े वैधानिक एवं आचार-संहिता नियंत्रक नियम जारी कर दिये गये । मानव जीवन अमूल्य है, अतः औषधि-नियंत्रक (Drug-Controller?) द्वारा विशद परीक्षणों के बाद ही उन्हें बाज़ार में लाने की अनुमति मिलती है । Eye-rolling फिर… क्योंकर चल रहा है, आज भी ‘फ़िज़ीशियन सैम्पल-नाट फार सेल ‘? blu_bull_e0 तीन – यदि यह मान लिया जाय कि अपने ब्रांड को अन्य प्रतिस्पर्धी ब्रांड से तुलनात्मक मूल्यांकन के लिये ऎसे ‘ सैम्पल ‘ देना आवश्यक है, तो बेचारे डाक्टर के पास इस तरह के मूल्यांकन के लिये समय, धैर्य और परखने के मापदंड ही कहाँ हैं ? blu_bull_e0 चार – इस तरह के तज़ुर्बे कोई चार-6-आठ अदद टेबलेट्स के बल पर तो नहीं किये जा सकते, सो इनका औचित्य ? न ही कोई गैर-संस्थागत डाक्टर इस तरह की कसरत के लिये अधिकृत ही है, फिर ? blu_bull_e0 पाँच – यदि हमारे नायक का सेल्स टारगेट चौंचक है, तो कोई भी कम्पनी इसकी परवाह नहीं करती कि इन सैम्पल्स का क्या हुआ ? यानि कि दुरुपयोग की खुली ग़ंज़ाइश ! blu_bull_e0 छः – एक भी कम्पनी कभी यह जानकारी नहीं रखती कि यह सैम्पल की दवायें, सरकारी.. गैर-सरकारी.. प्रशिक्षित.. अप्रशिक्षित डाक्टर तक पहुँचे, या बुआ मामी के हितार्थ, या लल्लू-पंज़ू एंड सन्स के काउंटर पर ? blu_bull_e0 सात – यह दो के चार बना कर तो नहीं..अरे रे लम्बा खिंच रहा है..अब बस करें ? ठीक, बस एक और आख़िरी.. blu_bull_e0 आठ – वैसे तो यह मानना निहायत ही बकवास है कि हमलोग न सही तो सरकार ही ब्यौरा ले कि हर सैम्पल के हर खेप में कितना टैक्स व एक्साइज़ ड्यूटी का वारा न्यारा किया जाता है ? चिदंबरम के लगाये फ़्रिंज़ टैक्स से कुछ फ़र्क़ तो पड़ा है, लेकिन ये अपुन का इंडिया है, भिडु.. मुट्ठी गरम.. तो तेवर नरम ! लगे रहो ब्लागर भाई… समझाओ इनको कि इसमें मुफ़्त तो ढूँढ़े मिल गया पर ससुरा बदनाम कहाँ है ? यह तो अब भी नहीं पकड़ पाये कि मलाई चाभैं ललुआ अउर मारे जायें कलुआ । तो इहाँ कलुआ हमरी बिरादरी है, भइय्यू !

क्षमा-याचना – यह  आलेख किसी भी जीवित या मृत मेडिकल रिप्रेज़ेन्टेटिव, वास्तविक या अवास्तविक डाक्टर, ज़ायज़ या नाज़ायज़ कम्पनी को हानि पहुँचाने के उद्देश्य से कदापि नहीं लिखा गया है । यह आलेख केवल सामान्य बुद्धि के बेचारे हिंदी ब्लागरों के लिये, एक हिंदी ब्लागर की ही उपज है । स्पष्टीकरण – रूपांतरण की डिफ़िसियेंसी के चलते यहाँ कुछ तो है यूँ ही निट्ठल्ले का कुप्रभाव परिलक्षित हो रहा होगा । हम नहीं सुधरेंगे, खेद है । धन्यवाद – दैनिक तूफ़ानी दौरे पर निकले ब्लागर बंधुओं का, जिन्होंने कुछेक टाइम यहाँ खोटी किया । टाइम इज प्रीसियस फार एवरी ब्लागर !