अविस्मरणीय, कम से कम मेरे लिये तो है ही ! दूसरे भभकी देते हों..शेख़ी बघारते हों या कि कुछ और..लेकिन मैं यह नहीं कह सकता कि मैंने दुनिया देखी है, क्यॊकि मेरे लिये अब तक दुनिया के रंग गिन पाना ही कठिन है…सो ? आज इस दुनिया का एक और रंग देखने को मिला । और यह रंग इस शिद्दत से हावी है, तब से…कि इस समय रात / सुबह के तीन बजे उठ कर यह पोस्ट लिखने बैठा हूँ । पूछिये..आख़िर ऎसा भी क्या हो गया ?
देखा जाये तो..कुछ ख़ास भी नहीं, कि आपको पढ़ने के लिये बाध्य ही किया जाये । ज़रूरी नहीं कि सभी की सभी रचनायें, सभी द्वारा पढ़ी ही जायें । वाक़या – दिन मंगलवार दिनांक 22 जुलाई 2008, समय – दोपहर के लगभग दो बजे का, स्थान – द क्लिनिक बोले तो मेरे दाना पानी का खोखा ! वही रूटीन – मैं, मेरा मरीज़ और मेरे चैम्बर की तन्हाई । अचानक साँस रोके हुये से शांति में एक हलचल , क्या है जी ? मैंने नज़रें उठायी । देखा.. पर्दे की झिरी से चच्चू का आधा चेहरा अंदर घुसते घुसते जैसे बीच अधर में लटका हुआ थम गया है । चच्चू यानि कि किशोर गुप्ता, उम्र में मुझसे लगभग दस बारह वर्ष छोटे, किंतु उनकी माँ के लंबे इलाज़ के दौरान उपजे रिश्तों से मैं उनको चच्चू कहने लगा । नज़ीतन आज वह जगत-चच्चू हैं । उनकी सज़्ज़नता और सरलता की वज़ह से मैं उनका पूरा आदर करता हूं, सो यह ख़लल बर्दाश्त करके, मैंने पूछा . बोलोगे कि क्या बात है, चच्चू ?
चच्चूजी चुप्प ..उनके चेहरे पर उपस्थित रहने वाली चिर-दीनता जैसे बाढ़ के पानी की तरह, मेरे पूरे चैम्बर में हड़हड़ा कर घुस आयी । उनके ज़बड़े खिंच कर कान के कोरों तक जा पहुँचे , और अपनी तीन ऊंगलियाँ जोड़ कर इशारा किया..बस एक मिनट ! मैंने बचने का प्रयत्न करते हुये कुछ आज़िज़ी से फिर दोहराया, ‘ अरे बताओ न, क्या आफ़त टूट पड़ी ? ‘ फिर वही – जुड़ी हुई व हिलती सी तीन ऊँगलियाँ …पर इस बार बुक्का फटने जैसा भाव भी चेहरे पर नमूदार हो गया । बगल में बैठे मरीज़ के साथ की जा रही, हिस्ट्री-टेकिंग की साधना तो भंग हो ही चुकी थी, लिहाज़न मैं स्वयं ही उठ कर उनके पास गया । पास पहुंचते ही चच्चू फफक पड़े,..’ वो व्वो वोन्नुपम ने ज़हर खा लिया, क्या होगा अब ? ‘ उनके पीछे नज़र गयी, उनकी पत्नी व दोनों लड़कियाँ हाथ मलती हुई खड़ी ताक रही थीं । मैंने सब-कुछ भाँप कर भी उनको हल्का करना चाहा – ‘ओह्हो, आज सपरिवार ! ‘ अब उनकी पत्नी ने आगे बढ़ कर स्पष्ट किया, “ अनुपम ने ज़हर खा लिया, कोई ज़हरीली दवाई पी ली है । “ अनुपम, उनका इकलौता बेटा,आँख का तारा !
अनुपम..14 वर्ष के दरमियान का ज़हीन लड़का, टी.वी., डी.वी.डी. प्लेयर वगैरह की समझ और मरम्मत में, किसी ट्रेन्ड इंज़ीनियर को भी पानी पिला देने वाला अनुपम ! इस वयस की उभरती रेखों से ट्रेडमार्कित इलेक्ट्रानिक्स का उभरता सितारा । जो भी हो..यह सब लफ़्फ़ाज़ी बाद के लिये छोड़ देते हैं, अभी तो अनुपम जी को देखें ! मैंने घूम कर स्टूल पर बैठे सज़्ज़न से माफ़ी माँगते हुये, ‘ रुकावट के लिये खेद है..सरीखा ‘ कुछेक मिनट का अनुपम-ब्रेक लेने की इज़ाज़त चाही, जो सहर्ष मिल गयी । मैं उधर तत्पर होने होने को था, कि वह बोलने को हुये, “ अच्छा ख़ासा यह भाई-बहन ख़ाना……”, कि मैंने उन्हें बरज दिया । अनुपम का एक सरसरी तौर पर मुआयना किया , दोनों पुतलियाँ बेहद फैली हुई और स्थिर.. रोशनी के प्रति क्षीण प्रतिक्रिया .. एट्रोपीन फ़ेमिली ही है..शायद, बुदबुदाते हुये खुद को आश्वस्त करना चाहा । किंतु प्रत्यक्ष में मुँह से निकला, “कौन सी दवा थी..कुछ अंदाज़ा है ? “ जि..ज्जी, जी हाँ, घर पर शीशी पड़ी है, बल्कि दोनों ही हैं, दिखाऊँ ? और मेरे उत्तर की परवाह किये बिना पलट लिये । तब तक मैं मैन्निटाल वगैरह शुरु कर चुका था । परामर्श व पैथालाज़ी से अधिक और आगे बढ़ने का मैंने कभी प्रयास ही नहीं किया । बड़ा बवाल है, ( इस पर फिर कभी ) अपनी बेलौस ज़िन्दग़ी, सोच की स्वतंत्रता, पारिवारिक अंतरंगता, मन का चैन.. इत्यादि सबका नाश हो जाता है, और सभी कुछ जोड़ घटा कर बाकी बचता है,..सिफ़र ! कई नर्सिंग होम हैं, यहाँ जिसके डाक्टर..अब छोड़िये भी, चिकित्सक तो कम किंतु मैनेज़र बहुत अच्छे हैं । सो अपरिहार्य परिस्थितियों में उनके प्रबंधन कौशल का लाभ उठाने में कोई बुराई नहीं दिखती और वह अनुगृहीत होते हैं, वो अलग !यहाँ तो दूसरी ही स्थिति थी..
ज़हर-ख़ुरानी बोले तो पाइज़निंग केस कोई भर्ती नहीं करता, कौन लफ़ड़ा पाले ? बेचारा सफ़ेद एप्रन.. x x x कोट से बहुत डरता है, उनकी ज़िरह बस x x x x x x केन्द्रित हुआ करती है । और अग़र x x x xपढ़े लोग इस x x x x x x x x x x x x x ही समझॊ । सो, यह सारी हिक़मत एक दूसरे एक्ज़ामिनेशन टेबल पर हमारे नियाज़-भाई और सुरेश सोनकर की निगरानी में अंज़ाम दी जा रही थी । कुछ रिश्ते ऎसे बन ही जाते हैं !![]()
…अल्लाह अल्लाह, खैर सल्लाह ! अनुपम जी कुनमुनाये, चच्चू जी मार्टिन की दो ख़ाली शीशीयों को उद्धिग्नता से लहराते हुये प्रगट हुये, दोनों लड़कियाँ हर्षायीं, श्रीमती चच्चू ने दोनों हाथों से आँचल का कोर पकड़ कर किन्हीं भगवान महोदय को श्रद्धा से नमस्कार किया, फिर मुझे देख कर लज़ा गयीं । नियाज़ भी अपने पैगंबर की प्रसंशा में कुछ बुदबुदा रहे थे । मेरा बेलौस मन बोल पड़ा, ‘अबे तेरा अल्लाह मियाँ, एक क़ाफ़िर की ज़िन्दग़ी क्यों बचाने लगा ? ‘ लोग मेरे इस तरह के खुल्ले मज़ाक का बुरा नहीं मानते । नियाज़ झेंप गये, “ऊऽ ..ऽ सब फाल्तू बात है नु, सऽब तो देखीए तो यक्कही है ।”
कोई चार-पाँच घंटे बाद सबको मैंने असहज मन से राजी-ख़ुशी विदा किया । दि एन्ड..नहीं जी ! मैं तो असहज हूँ, अभी से कहाँ टिपियाने की तैयारी कर रहे हैं आप ? बाद के इन ईज़ी आवर्स में हुये वार्तालाप से यह निचोड़ निकला कि ख़ाना-वाना खा कर सभी भाई बहन एक ख़ुशहाल परिवार के बच्चों की तरह टी.वी. देख रहे थे । संसद में बह्स-वोटिंग वगैरह का प्रहसन चल रहा था…. ..टी.वी. पर लगातार कुछ आ ही रहा होगा, मैंने तो देखा नहीं ! इतने में भाई-बहनों में लड़ाई हो गयी…. दीदी सोनिया की चेली व भईय्या अडवानी का चमचा । संसद की तर्ज़ पर घर में ही हो गया घमासान । दीदी ने पीट दिया, भईय्या ने नोंच लिया । सर्विस शाट इधर से उधर होने लगे । भईय्या अपनी शारीरिक क्षति से कम घायल थे, किंतु अडवानी के अपमान से बिलबिला रहे थे । अंत में इसका बदला लेने का उनको एक ही ज़रिया दिखा, सुसाइड करके दीदियों को मज़ा चखा दो ! बोलो, जय श्रीराम !
मैं ख्वामखाह असहज हो गया, यह तो हमारे राजनीतिक चैतन्यता का ज्वलंत उदाहरण है । मैं तो तय नहीं कर पा रहा, रास्ता कौन दिखाये ![]()
पुनःश्च ( इसका आजकल प्रचलन है, जी ) कल यह पोस्ट लिख तो लिया, किंतु बिना चच्चू की जानकारी में लाये नेट पर चढ़ाना ठीक न लगा । आज सम्पर्क हुआ, वह ओस्कर के डी.वी.डी. प्लेयर की खूबियाँ किसी ग्राहक को समझाते समझाते लपक कर आये । मेरी बात कुछ समझे ..कुछ शायद नहीं भी समझे । निश्चिंत से सब मुझ पर ही छोड़ दिया,’छाप दीजिये इंटरनेट पर..ये सब तो राजकाज है । कौन देखेगा..कौन पढ़ेगा..पढ़ भी लेगा तो मुझे ही कौन पहचानेगा ?“ अनुपम जी वैसे ही सनाका खाये हुये हैं, आज कमरे से ही नहीं निकले । एक बार उनको दिखला दीजियेगा ।
24 July , 2008 at 1:29 am
दुखद…. पर ये आधी यहाँ और आधी वहाँ समझ नहीं आई, ऐसा क्यों ?
24 July , 2008 at 1:48 am
अफसोसजनक….दुखद..हद है भई!
24 July , 2008 at 2:27 am
ऐसे केसेज से निपटना बहुत कठिन होता होगा। बच्चा ठीक हो गया, खुशी की बात है।
घुघूती बासूती
24 July , 2008 at 3:17 am
@ दिनेशराय द्विवेदी
लो हट गया जी, मैं तो पहले ही बोला था कि बहुत डरता हूँ, जबकि झूठ भी दाल मॆं नमक बराबर ही रहा करती है । सादर ब्लागरीय अभिवादन
24 July , 2008 at 2:36 pm
गुरु देव….ये तो फ़िर भी देश से जुडा हुआ जहर था लोग तो इस बात पे खा लेते है की मम्मी ने पिक्चर देखने से मना किया था…..खैर आप जुटे रहिये….
24 July , 2008 at 6:31 pm
aati uttam lekh, bahut mazedar laga. Dhanyabad.
24 July , 2008 at 8:53 pm
बहुत अफसोस जनक लगा !
24 July , 2008 at 11:54 pm
बेहतरीन पोस्ट। लड़के भी कैसे लड़ते हैं।
27 July , 2008 at 11:44 pm
samajh nahi aata kya kaha jaye…afsosjanak ya ..kuchh aur..
8 August , 2008 at 5:33 pm
आपके ब्लॉग का ले आउट बहुत ही प्यारा है। पर न जाने क्यों कभी कभी कमेंट बॉक्स तक पहुंचने के लिए बहुत पापड बेलने पडते हैं। कृपया इस समस्या पर गौर फरमाएंगे।
15 August , 2008 at 5:10 pm
इस तरह की घटनाएं बढती ही जा रही हैं, रोज कुछ न कुछ पढने में आ जाता है कि फलां बच्चे ने ये किया, फलां ने टी वी देख वो कर लिया……खैर, युवक की जान बच गई यही बहुत है।
12 September , 2008 at 9:29 pm
तव्हांजो ब्लाग डिसी खुशी थी। डाढी सुठी कोशिश आहे।
आपका ब्लाग देखकर खुशी हुई। बढि़या प्रयास है।
दीपक भारतदीप
13 September , 2008 at 12:34 pm
क्या कहूँ, समझ नही आता, अफ़सोस की इंतहा है, ये reaction है हमारा, किसी को क्या फर्क पड़ता है, बेवकूफ तो हम ही हैं न…बेहद अफसोसनाक…
अब थोड़ा आपके अंदाज़ की बात…. क्या कहूँ, लफ्ज़ नही मिलते, लेकिन जब भी आपकी पोस्ट पढ़ती हूँ, कमेन्ट के लिए सही अल्फाज़ नही मिल पाते जिस से आपकी तारीफ़ कर पाऊं, ये अंदाज़ ब्लोगिंग की दुनिया में बस आपका है अमरजी…सब से अलग…सब से जुदा और बेहद प्यारा
27 September , 2008 at 4:56 pm
लगता है आजकल आप बहुत बिजी है। नई पोस्ट का इंतजार। कब पूरा होगा सरकार?
5 October , 2008 at 10:28 am
महाराज ! कहाँ गायब हो जाते हो इतने दिनों के लिए …..??
23 January , 2009 at 10:23 pm
हाय रे!? ”बस,सिर्फ़ दो मिनट”
17 April , 2009 at 1:11 pm
इस ब्लॉग की भी खैर खबर लेते रहें।
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जादू की छड़ी चाहिए?
नाज्का रेखाएँ कौन सी बला हैं?